गिलोय के फायदे | Giloy ke fayde in hindi | Giloy Benefits

इस पोस्ट में हम आपको गिलोय के फायदे (Giloy ke fayde in hindi) के बारे में बताने वाले है | आयुर्वेदिक दवाओं और घरेलू उपचार में गिलोय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है | बड़े-बड़े पत्तों वाली इसकी हरी-भरी बेले बाग बगीचों में सुंदरता के लिए लगाई जाती है | इसकी लताएं नीम के पेड़ों, पहाड़ी चट्टानों तथा अन्य पेड़ों पर चढ़ी हुई अक्सर देखी जा सकती हैं | लता तना छोटी उंगली से भी पतला अथवा अंगूठे से भी मोटा हो सकता है, कभी-कभी यह मोटा भी देखा गया है | जब गिलोय जमीन पर फैलती है तो स्थान स्थान से निकलकर इसकी रस्सी जैसी जड़े जमीन में प्रवेश कर जाती हैं, लेकिन जब यह पेड़ पर चढ़ी होती है तो यह जड़े या रेशे जैसे नीचे की ओर झूलती रहती है, गिलोय भारत में सर्वत्र पाई जाती है |

गिलोय के फायदे (Giloy ke fayde in hindi)

giloy ke fayde in hindi

इसके तने को छीलने पर हरा मोटा भाग दिखाई पड़ता है, इस पर यत्र तत्र नन्ही नन्ही गाँठें सी नजर आती है | तना सूखने पर सिकुड़ जाता है और छल पृथक झूलती दिखाई पड़ती है | गिलोय स्वाद मे तिक्त होती है तथा इसमे कोई गंध नही होती है, जब इसका तना कट कर मसला या पिसा जाता है तो इसमे लोआब आरएस निकलता है । गिलोय के पत्ते पैन जैसे या हरदयाकार होते है, यह तने मे एकांतत्र रूप से निकलते है |

गिलोय पौधा कैसा दीखता है | Giloy Plant kaisa dikhta hai

giloy plant

गिलोय के फूल ग्रीष्म ऋतु में छोटे-छोटे गुच्छों में पत्रकौण के पास निकलते हैं, इनका रंग पीला होता है, गिलोय के फल गुच्छों में छोटे मटर की तरह होते हैं, यह कच्ची अवस्था में हरे किंतु पकने पर लाल हो जाते हैं, फलों के बीच सफेद, कुछ टेढ़े, चिकने और मिर्च के दाने की तरह होते हैं ।

गिलोय के विविध नाम | Giloy Names

शास्त्रों में गिलोय को अमृत से उत्पन्न बताया गया है इसी से इसको अमृत अमृता भी कहते हैं इस को काटकर छाया में रख देने से भी इसमें कतले सूट आते हैं | इससे इसको अमृत बल भरी कहा जाता है गुणों की दृष्टि से इसका अमृता नाम परम सार्थक है | संस्कृत में इसको गुडूची, अधुपर्णी आदि भी कहा जाता है | हिंदी – गिलोय, गुर्च, गुडीच आदि नाम से जाना जाता है, लेटिन–टिनोस्पोरा कोर्डीफोलिया । 

giloy benefits


उपयोगी अंग और मात्रा 

इसके तने और पत्तों का ही मुख्य रूप से औषधि में प्रयोग होता है इसका तना हरा ताजा और सुखा कर रखा हुआ काम में लाया जाता है नई पतले तने वाली गिलोय की अपेक्षा पुरानी उंगली या अंगूठे जैसी मोटी गिलोय दवा के लिए अधिक उपयोगी होती है, ऐसे मोटे टुकड़े काटकर और छाया में सुखाकर रखना चाहिए या ताजी गिलोय अधिक लाभकारी रहती है । मात्रा चूर्ण 1 से 3 ग्राम तथा स्वरस 10 से 20 ग्राम तथा कवाथ 30 से 50 ML तक |

गिलोय के फायदे | Giloy Benefits

गिलोय गुरु, स्निग्ध, तिक्त, कषाय, उषणवीर्य, विपाक में मधुर और त्रिदोष नाशक है, पित्त्ज विकारों के शमन में यह अति उपयोगी है | यह दीपन-पाचन, हृदय को हितकर, मूत्रल, पौरुष वर्धक, रक्तशोधक, रक्तवर्धक एवं रसायन है | गिलोय प्रमेह, श्वेत प्रदर, प्यास, दा, कास, पांडू, कमला रोगों के बाद की दुर्बलता ज्वर, मूत्र क्रच्छता, वमन अम्लता, अग्निमांद्य और यकृत विकारों में अत्यंत लाभदायक होती है, यह तनाव शामक व कुछ निद्राकर भी है | आधुनिक मतानुसार इसमें गिलोइन, गिलोइनिन, गिलोस्टेराल, व सूक्ष्म मात्रा में बार्बेरीन और किंचित मोम युक्त पदार्थ रहते हैं |

शास्त्री औषधियां- अमृतारिष्ट, गिलोय सत्व, संशमनी बटी, गुडुच्यादी कवाथ आदि, इसके अतिरिक्त सहयोगी पदार्थ के रूप में भी इसका व्यापक प्रयोग किया जाता है । 

गिलोय के विविध प्रयोग तथा उपयोग –

गिलोय घन सत्व – गिलोय सत्व बनाने के लिए इस प्रकार है, अंगूठे जितनी ताजी मोटी हरी गिलोय लाकर उसको पानी से अच्छी तरह धोकर 3-3 इंच लंबे टुकड़े काट लें, इन को अच्छी तरह कुचल कर लोहे या अल्मुनियम की कढ़ाई में 4 गुना पानी डालकर उबालें, जब चौथाई पानी रह जाए तो ठंडा करके कपड़े में दो से तीन बार छान ले और फिर कढ़ाई में डालकर इस कवाथ को इतना पकावे की यह शहद से भी कुछ अधिक गाढ़ा हो जाए।  जब अग्नि पर से उतार कर इसे धूप में सुखा ले कि यह गोलियां बनाने लायक हो जाए। अब इसकी गोलियां बनाकर रखें और आवश्यकता पड़ने पर गोलो कि कूट पीस कर प्रयोग करें। 

संशमनी बटी –  उपरोक्त गिलोय घन की 2-2 रत्ती की गोली बना लें यही संशमनी वटी या गुडूची घन वटी है।

यह सरल से प्रतीत होने वाली औषधि वास्तव में बड़ी लाभदायक है इसकी 5 से 10 तक गोलियां दिन में चार-पांच बार जल के साथ देने से समस्त प्रकार के ज्वर में लाभ होता है, जीर्णाज्वर और राजयक्ष्मा के ज्वर में इससे लाभ होता है,  ऐसे असाध्य ज्वर जिनके कारण का पता अनेकों परीक्षणों के पश्चात भी नहीं लग पाता उनको यहां गिलोय सत्व नष्ट कर देता है। किसी भी लंबी अवधि के पश्चात आई हुई दुर्बलता इनके सेवन से चली जाती है और शरीर में नई शक्ति आती है।  गुडुची के घन में चतुर्थांश अतीस का चूर्ण मिलाकर दो-दो रत्ती की गोली बना लें, इसमें से 5-10 गोलियां जल के अनुपात के साथ देने से विषम ज्वर में भी लाभ होता है ।

सर्व ज्वरहर वटी – गिलोय सत्व 12 ग्राम, पित्त पापड़ा का चूर्ण 12 ग्राम, चिरायता चूर्ण 6 ग्राम, छोटी इलायची बीज 3 ग्राम तथा छोटी पीपल का चूर्ण 3 ग्राम को एक साथ मिलाकर गिलोय के रस में तीन भावनाएं देकर मटर से कुछ बड़ी-बड़ी गोलियां बना लें।  मात्रा 2-2 गोली दिन में तीन बार गर्म जल से लें। यहां गोलियां सभी प्रकार के ज्वर में आंख बंद करके दी जा सकती है और उत्तम लाभ होता है।

रोगों से आई निर्बलता में गिलोय का उपयोग– गिलोय सत्व 50 ग्राम, सितोपलादि चूर्ण 100 ग्राम, प्रवाल पिष्टी 12 ग्राम मिलाकर रख ले,  मात्रा दो दो चाय के चम्मच प्रातः शाम मधु या किसी सरबत से चाट कर ऊपर से थोड़ा दूध पिए, रोगों से आई दुर्बलता दूर होकर जल्दी ही शरीर हष्ट पुष्ट हो जाता है, इससे जीवनी शक्ति बढ़कर शरीर में रोग अवरोधक शक्ति आ जाती है, लगातार दो तीन माह सेवन करने से लाभ मिलता है।

नजर की कमजोरी- सूखी गिलोय और त्रिफला समान मात्रा में मोटा-मोटा कूटकर रख लें 15 ग्राम यह चूर्ण लेकर 120 ग्राम पानी डालकर किसी हांडी में आग पर चढ़ा दे, पकाकर जब यह पानी लगभग चौथाई रह जाए तो उतार लें, इस काढ़े को छानकर इसमें 2 चम्मच शहद और 1/4 ग्राम पीपल का चूर्ण मिलाकर इसमें से आधा आधा सवेरे शाम पीएं, साथ ही इसी चूर्ण के पानी से आंखें धोते रहे तो शीघ्र लाभ होता है, 10 ग्राम इस चूर्ण को एक गिलास ताजा पानी में शाम को भिगो दें, सुबह इसी निथरे हुए पानी से आँख धोना चाहिए।

पौरूष वर्धक योग – गिलोय सत्व 2 भाग, लोह भस्म, अभ्रक भस्म, वंग भस्म, छोटी इलायची के दाने व छोटी पीपल का चूर्ण एक एक भाग मिलाकर रख ले। मात्रा- आधा ग्राम प्रातः शाम शहद से चाट कर दूध पीने से नसों को बल मिलता है यह नपुंसकता, शिथिलता एवं दुर्बलता नाशक उत्तम औषधि है ।

मधुमेह – गिलोय के तने  का स्वरस को मधुमेह में बहुत लाभकारी पाया गया है।  अधिकांश रोगियों में इसके सेवन से मूत्र में आने वाली शर्करा की मात्रा में कमी आती देखी गई है।  लगातार 2 सप्ताह तक सेवन करने से स्पष्ट लाभ दिखाई देने लगता है परंतु मूत्र में शर्करा की मात्रा घटाने तथा रोग को नियंत्रण में रखने के लिए इसका लंबे समय तक प्रयोग करना हितकर रहेगा।  मात्रा – 15 से 30 मिलीलीटर स्वरस को आधे से एक चाय के चम्मच शहद के साथ दिन में एक या दो बार रोग की गंभीरता के अनुसार सेवन कराएं।

इसके उपयोग से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। वायरल बुखार जैसे डेंगू , चिकनगुनिया में इसके सेवन से खून में प्लेटलेट्स  की वृद्धि होती है। इसके नित्य सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है ।जोड़ों के दर्द में भी इससे विशेष लाभ होता है।
प्रयोग-रोगी व्यक्ति के साथ स्वस्थ मनुष्य भी इसका नित्य सेवन कर सकते हैं। इसके तने को पानी मे उबालकर लें, या होमियोपैथी में Tinospora cordifolia Q मदर टिंक्चर आता है, जिसे प्रयोग किया जा सकता है। इस औषधीय पौधे को अपने आस पास,पेड़ों पर जरूर लगाएं। यह प्रकृति प्रदत्त एक दिव्य औषधि है।

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